तर्क से आगे fundamentalexpressionshindi

मानव क्रोध, भय, तनाव, असमंजस, प्रसन्नता के द्वारा प्रतिरोध को अनुभव करता है। साथ ही वह यह देख सकता है कि वह क्रोध, भय इत्यादि को अनुभव कर रहा है। यह देखना आपको मूल प्रतिरोध से मिला देता है जिस के द्वारा जीवन, मन चल रहा है, को दिखा देता है। भ्रम यह हो जाता है, जैसे कि प्रसन्नता इत्यादि स्वीकार्य है और क्रोध, भय इत्यादि अस्वीकार्य है। इस पक्षपाती व्यवहार को रोकना आपको मूल से मिला देता है।

Y V Chawla
Hindi Book तर्क से आगे

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इस पल और अगले पल में अस्पष्टता को स्वीकारते ही मन पूर्ण विश्रांति की अवस्था में आ जाता है। अब आप जो भी कर रहे हैं उस में लगे हैं क्योंकि ऊर्जा अगले पल को पक्का करने, परिभाषित करने के आराम को पकड़ने में नहीं बिखरती। जबकि पहले विचार इस अस्पष्टता को ढ़कने, मिटाने में व्यस्त रहता है जैसे कि यह (विचार) नियंत्रक है। इस आराम को पकड़ना ही क्षीणता, असतर्कता, मृत्यु है।
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पूर्ण संतुष्टि और इच्छा

किसी भी इच्छा का पूरा होना न इच्छा को समाप्त कर सकता है और न ही पूर्ण संतुष्टि तक ले कर जा सकता है । किसी भी इच्छा का उठना और पूरा होना एक प्रक्रिया है, एक स्वचालित प्रक्रिया। पूर्ण संतुष्टि की प्रतीक्षा पल-पल इच्छा का उठना और पूरा होना की प्रक्रिया को देखने नहीं देती। जब आप हर पल हो रही इस प्रक्रिया को देखते हैं, पूर्ण संतुष्टि का विचार गिर जाता है, स्वचालित प्रक्रिया नज़र आने लगती है। और हर पल इस प्रक्रिया को आप तब देख सकते हैं जब आप किसी इच्छा के पूरा ना होने को किन्हीं विचारों, सिद्धांतों या दिलासे से नहीं बांधते।
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क्या आप देख सकते हैं कि मन हमेशा बेआरामी की अवस्था में ही रहता है? मन की इस बेआरामी से एक होना आपको मूल से मेला देता है। अब हर कार्य तनावमुक्त, रचनात्मक, होशपूर्वक होता है। मन भ्रम के कारण (मानसिक) आराम को स्थिर करने में लगा रहता है या इस भ्रममें आ जाता है जैसे कि यह सुरक्षितहो गया है-यही क्षीणता, असतर्कता, मृत्यु है।
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सब कुछ क्रियाशील है। कुछ भी संतोषजनक, अच्छा या अंतिम मानना मन को आराम का भ्रम देता है जो समय में कभी भी टूट जाएगा। इस तथ्य का आपके ध्यान में आना सभी कुछ ताज़ा और नया बना देता है। आराम सतर्कता में बदल जाता है- यह आपका मूल से संबंध है।

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मन लगातार व्याख्यायों, निष्कर्षों द्वारा संतुष्टि पाने में लगा रहता है. यह करने (या न करने) और देखने कि क्या होता है, में संतुष्ट नहीं होता। यह अज्ञात अंतर को सहन करने से डरता है। यह अज्ञात अंतर अनंत संभावनाओं का धरातल है। मन व्याख्यायों और निष्कर्षों द्वारा निश्चितता और आराम (भ्रामक) को पकड़ कर रखता है। इस आराम को छोड़ना मन को एक अनिर्णीत अवस्था में ले जाता है। यह अवस्था ही आपका मूल से संबध है।

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जब आपकी बनाई हुई योजनाएं पूरी नहीं होती तो आपका मन व्याकुल हो जाता है। यह पूर्ण विश्रांति को तब पाता है जब यह देख लेता है कि अस्तित्व विस्मय की प्रक्रिया से चलता है न कि केवल गणनाओं और तर्कों के द्वारा। और आप विस्मय की प्रक्रिया से अपने आप जुड़ जाते हैं जब आप किसी नापसंद स्थिति की बेआरामी से बच के नहीं निकलते।

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पल की आणविक गति

जब आप किसी तथ्य या चुनौती को बिना दोष लगाये, बिना शिकायत किये, बिना आत्मग्लानि के देखते हैं तो उस पल स्वयं ही कर्म उजागर हो जाता है (कुछ करने या न करने के रूप में), यह पल की आणविक गति है।
जब आप दोष लगाकर, शिकायत करके या आत्मग्लानि से देखते हैं तो भी कर्म उजागर होता है, लेकिन आपका ध्यान उस पल में अनुभव की गई कमीं को संतुष्ट करने में लग जाता है।
पल की आणविक गति को देखना अपने आप में आनंद है।
यह आपका पूर्ण से संबंध है।

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आसक्ति

किसी वस्तु, कार्य या स्थिति में आपकी आसक्ति, झुकाव इसलिये बढ़ जाता है जब आप किसी और कार्य को विवशता पूर्वक कर रहे होते हैं या आप जो परिस्थिति आपको नापसंद है उसकी बेआरामी से बचना चाहते हो।

यह आसक्ति ही शोक और संताप का कारण है। इस बात का आप के ध्यान में आना आपको मूल ऊर्जा से मिला देता है।

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आप किसी व्यक्ति या परिस्थिति के कारण परेशान नहीं होते, बल्कि इसलिये कि आप मानसिक बेआरामी से बचना चाहते हो। यह बचना शिकायत करके, दोष लगा कर, अपने को दोषी मान कर या यह सोच कर कि भविष्य में सब ठीक हो जायेगा-के द्वारा होता है।

इस बचने के आराम को छोड़ना आपको मूल से मिला देता है।

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