सुखी और प्रसन्न रहने का क्या उपाय है ?

कोई भी अप्रसन्न नहीं है, जब तक कि वो किसी तुरंत शारीरिक खतरे में नहीं है| वो केवल मानसिक बेआरामी अनुभव कर रहा है क्योंकि कुछ ऐसा हो गया है जो वह नहीं चाहता या उसको पसंद नहीं है| क्या आप यह देख सकते हैं?—–

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कुछ लोग मोटीवेशनल बातें सुनकर ही मोटीवेट होते हैं और कुछ दिनो बाद फ़िर से सब भूल जाते हैं, क्या आपके पास कुछ तरीके हैं जिससे कि लम्बे समय मतलब कि जब तक मंजिल ना मिल जाये तब तक वो अपने काम के लिये तत्पर रहे?

मोटीवेशनल बातों से जो आराम मिलता है, हम समझते हैं कि यह स्थिर हो जायेगा।

मन विचारों और व्याख्यायों से सुरक्षित आराम दूंढ़ता रहता है जैसे कि इनसे कोई कमी पूरी हो जायेगी और यह सुरक्षितहो जायेगा। यह आराम ध्यान देने से हट जाता है क्योंकि यह भ्रम ही था। अब आप आने वाले पल को आश्चर्य से देखते हैं बजाय कि इसको विचारों या व्याख्यायों में फिट करने के। यह देखना कि इस पल और अगले पल में प्रतिरोध को हल नहीं किया जा सकता, आपको पूर्ण विश्रांति से मिला देता है। आप अनंत संभावनाओं से जुड़ जाते हैं।

असमंजस में स्पष्टता देखना मन का कार्य है| इस कार्य को बंद नहीं किया जा सकता।——

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क्या हमारे ब्रह्माण्ड में वाकई कोई शक्ति मौजूद है?

जो कुछ भी आपके सामने है – ब्रह्माण्ड, आकाशगंगाएं इत्यादि मूल नहीं हो सकता।
मूल को देखने के लिये अपने आपको भी बीच में शामिल करना होगा।—

https://hi.quora.com/ब्रह्माण्ड के पार

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बेआरामी का अनुभव और पूर्ण ऊर्जा

आप अपने मन से बेआरामी के अनुभव होने को बाहर फेंकने की कोशिश करते हैं। कुछ भी दिमाग से बाहर नहीं फेंका जा सकता। पूरी ऊर्जा यहां है। 

आप अपने मन से बेआरामी के अनुभव होने को दूर फेंकने की कोशिश करते हैं। कुछ भी दिमाग से बाहर नहीं फेंका जा सकता। पूरी ऊर्जा यहां है।

मूल प्रश्न, मूल दुविधा और मानसिक आराम देने वाले विचार

हम देखते हैं कि लोग निरंतर भगवान, धार्मिक क्रियाओं, कर्म, भाग्य, मुक्ति, सकरात्मक विचार, ध्यान इत्यादि की बातें करते हैं जैसे कि कोई अभ्यास, कोई सिद्धांत , कोई विचार आपको प्रतिरोध (बेआरामी और अनिश्चितता) से बचा सकता है।

यह सभी बातें और विचार केवल मानसिक आराम देने का काम करते हैं। मूल प्रश्न, मूल दुविधा दबी रह जाती है।

या तो आप इस बात को ध्यान पूर्वक (बिना कोई वैचारिक बहाना तलाश किये) देख सकते हैं या जब आपके ऊंचे विचार, आराम देने वाले विचार (चाहे वो धार्मिक-आध्यात्मिक ही हों) किसी वास्तविक, तकलीफ़देह, अडिग स्थिति के आमने-सामने खडे हो जाते हैं, तब आपकी ऊर्जा एकत्रित हो जाती है।

क्या आप इस समय जैसा है वैसे ही देख सकते हैं, जब आपके ऊपर कोई शारीरिक खतरा नहीं है, चाहे जितनी भी मुश्किल परिस्थिति है, चाहे कितना भी आपको नीचा दिखना पड रह है, चाहे आप कितना भी भय अनुभव कर रहे हैं, चाहे आप कितनी भी अनिश्चितता, उलझन अनुभव कर रहे हैं?

आप मूल धरातल पर हैं।

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जीवन के मूल असमंजस को किसी व्याख्या या उक्ति से हल नहीं किया जा सकता है

जीवन के मूल असमंजस को किसी व्याख्या या उक्ति से हल नहीं किया जा सकता है। यह ध्यान देने से ही ठहरता है।

आपको केवल एक ही कदम उठाना है। आपको पुस्तकों, गुरुओं, तकनीकों के द्वारा आपकी वर्तमान असंतोषजनक स्थिति के विपरीत जो आराम आपके सामने रखा जा रहा है, को चुपचाप बिना किसी प्रतिक्रिया के नकारना है।

क्या आप जीवन के मूल असमंजस को देख सकते हैं?

आपको क्यों बेआरामी और अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है, अर्थात, उलझन, भय, शोक, कुछ भी जो आपको नापसंद है, इत्यादि। यह मानव के लिये मूल असमंजस है।

कोई भी बेआरामी या उलझन वाली परिस्थिति और अनिश्चितता आपकी मानसिक तंत्राओं में बेआरामी उत्पन्न करती है। आप इस बेआरामी को दिलासा देनेवाली व्याख्याओं या मनोरंजन या धार्मिक-आध्यात्मिक विचारों का सहारा लेकर मस्तिष्क से बाहर फेंकने की कोशिश करते हो। मन यह समझता है कि वो इस बेआरामी को हल कर लेगा। जब तक आप इस बेआरामी को ‘जैसे है वैसे ही’ नहीं अनुभव करते, ऊर्जा एकत्रित नहीं होती। आप मनोरंजन इत्यादि के मोह में फंस जाते हैं। जीवन की मूल ऊर्जा से आपका संपर्क छूटने लगता है।

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भगवान के अस्तित्व को कैसे स्वीकार करें?

आप भगवान की इच्छा और अपनी इच्छा में अंतर को महसूस करते हैं-मानसिक बेआरामी, मानसिक प्रतिरोध से| जब आप इस बेआरामी, इस प्रतिरोध को बिना किसी विचार या व्याख्या के समाहित कर लेते हैं-दो इच्छाओं का अंतर समाप्त हो जाता है|

दो इच्छाओं का विचार ही गिर जाता है|

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