मैं और जीवन ऊर्जा

जब आपको भूख लगती है तो केवल एक ही विचार भोजन का ही आता है। जब भोजन पेट में जाकर पाचन प्रक्रिया शुरू होती है तो मस्तिष्क भी काम करने को तैयार हो जाता है।
विचार चलने शुरू हो जाते हैं। ’मैं’ का विचार, भगवान, आत्मा के विचार, इत्यादि।
विचार जीवन ऊर्जा से उत्पन्न होते हैं। पसंद-नापसंद की प्रक्रिया में ‘मैं’ उलझ जाता है।

Y V Chawla

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‘क्या करना चाहिये’ या ‘क्या नहीं करना चाहिये’

‘क्या करना चाहिये’ या ‘क्या नहीं करना चाहिये’ विचार की दुविधा है। मन ‘क्या करना चाहिये’ या ‘क्या नहीं करना चाहिये’ के द्वारा आराम, संतुष्टि की तलाश में रहता है।
यह आराम ही भ्रम है।

’करना’ या ‘ना करना’ पूर्णता की अभिव्यक्ति है।

Y V Chawla