Monthly Archives: फ़रवरी 2012

सुख- दुख की प्रक्रिया से निकलने का कोई रास्ता नहीं है

सत्य या भगवान को जानने के नाम पर मन एक आरामदायक अवस्था की तलाश में ही रहता है। यह मन की सीमा है। वह इससे आगे चाह ही नहीं सकता, जान ही नहीं सकता। मन इस भ्रम में रहता है … पढना जारी रखे

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मन दुख और विवशता के विरोध में ही संतुष्टि, प्रसन्नता का अनुभव कर सकता है। यह मन का बंधन है, प्रोग्राम है। मन इस भ्रम में आ जाता है जैसे कि संतुष्टि या प्रसन्नता ठहर जाएगी या ठहर सकती है। … पढना जारी रखे

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हर पल जीवंत, सक्रिय और नया है

हर पल जीवंत, सक्रिय और नया है। किसी भी अभ्यास, तकनीक या प्रतीक्षा से इस तथ्य को जानना इस पल के जीवंत, सक्रिय और नया होने को नकारना है। Fundamental Expressions

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