तनाव

मन इसलिये तनाव में रहता है क्योंकि वह तर्क, नियमों, कारणों और परिणामों की व्याख्यायों के द्वारा संतुष्टि ढ़ूंढता रहता है या कर्म और परिणाम को किसी फार्मूले में बांधना चाहता है।
हर पल अव्यक्त से आता है। अब मन अचंभित हो जाता है। यह अभी भी तर्क से ही काम करता है, पर तर्क से बंधा हुआ नहीं रहता। अब हर कर्म एक प्रयोग (experiment) है।
Y V Chawla

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प्रसन्नता

आप तभी प्रसन्न रह सकते हैं जब आप विरोधाभास, अस्पष्टता, नकारत्मकता, अनिश्चितता के साथ सहज हैं।

Y V Chawla

कर्म की गति

हर कर्म के दो हिस्से होते हैं। एक सनसनी वाला (मैंने किया है, मैं कर सकता हूँ, ऐसा कैसे हुआ–) और दूसरा कर्म की वास्तविक गति। हमारी ऊर्जा सनसनी वाले हिस्से में से संतुष्टि पाने में लग जाती है, बजाए कि कर्म की गति देखने में। सनसनी वाले हिस्से को अपने अंदर शून्य करना ही सारा रहस्य है।

Y V Chawla