विचार की दुविधा

‘क्या करना चाहिये’ या ‘क्या नहीं करना चाहिये’ विचार की दुविधा है। मन ‘क्या करना चाहिये’ या ‘क्या नहीं करना चाहिये’ के द्वारा आराम, संतुष्टि की तलाश में रहता है।
यह आराम ही भ्रम है।
’करना’ या ‘ना करना’ पूर्णता की अभिव्यक्ति है।

Y V Chawla

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साम्यावस्था का आनंद

जब तक आपके कार्य विवशता, ‘करना चाहिये’ और मनोरंजक, आरामदायक (चाहे वो आध्यात्मिक ही क्यों न हों) में बंटे हुये हैं, आप मूल को नहीं छू सकते। आप साम्यावस्था के आनंद को नहीं जान सकते।

Y V Chawla

ज्ञान की पराकाष्ठा

किसी भी दिशा में आरामपूर्वक और होशपूर्वक किया गया कोई भी कार्य आध्यात्मिकता और ज्ञान की पराकाष्ठा है। हम इस तरह कार्य करते हैं जैसे परिणाम या कल का आराम हमें विवशता, चुनाव, दुविधा, अनिश्चितता के प्रतिरोध से बाहर ले जाएगा। हमें कर्म में आराम देखना है। हम परिणाम के द्वारा आराम की खोज में रहते हैं।
Y V Chawla