मूल को देखने का दबाव (Pressure to see ‘what is’)

हम समस्या के समाधान और उसके मूल को देखने की बजाय धार्मिक, आध्यात्मिक क्रियाओं का सहारा लेते है- टालने और प्रतीक्षा की प्रक्रिया चलती रहती है| मूल को-जो है, उसको देखने का दबाव ही नहीं बनता| इस दबाव का बनना आपके अंदर से समस्या उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया का ही अंत कर देता है| अब हर कर्म सजगता से होता है, रचनात्मक बन जाता है|

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आप संसार से एक क्रियाशील व्यवस्था से बंधे हैं न कि संतुष्टिपूर्ण या आरामदायक व्यवस्था से

मन इस भ्रम में रहता है कि वो सत्य को किसी नियम या परिभाषा में बांध सकता है। जब ऐसा कुछ सामने आता है जो नियम के परे होता है, जो मन की पसंद के परे होता है, जो मन के आरामदायक घेरे से बाहर होता हैतो उसको यह क्रोध, तनाव, चिंता, डर, दुविधा, ग्लानि, इत्यादि अभिव्यक्तियों से नकार देता है।

यह अभिव्यक्तियां नियम से परे का संकेत देती हैं।

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Y V Chawla