तकनीकी, आर्थिक, वैज्ञानिक उन्नती के बावजूद जीवन दुर्घटना, बीमारी, नुकसान से बंधा हुआ है. इस विषय को जांचना मूल प्रश्न है, मूल समस्या है.

तकनीकी, आर्थिक, वैज्ञानिक उन्नती के बावजूद जीवन दुर्घटना, बीमारी, नुकसान की समस्या से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा है. म्रत्यु अभी भी एक रहस्य की तरह है, चाहे हमने इसकी अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया है.

हम समझते हैं कि  विज्ञान, अर्थशास्त्र या भगवान इत्यादि के विचार इस विषय को हल देंगे.

क्या आप देख सकते हैं की कोई भी विचार इस विषय, इस प्रश्न को कल पर टाल देता है.

या तो यह प्रश्न आप में उठता ही नहीं है. आप अपने आपको व्याख्यायों से शांत कर लेते हैं.

लेकिन अगर आप अड़ जाते हैं इस प्रश्न को हल करने के, इसकी वास्तविकता जानने के लिए – कि आप इस प्रश्न का हल बिना टाले अभी पाना चाहते हैं. आप अडिग हैं अपने प्रश्न पर.

अचानक आप देखते हैं की कोई उत्तर इसका हल नहीं है. आप अकेले हैं. आप किससे उत्तर या हल मांग रहे हैं.

अब आपके सभी दिलासा या सांत्वना देने वाले विचार गिर जाते हैं. यह उत्तर या हल मिलने की असमर्थता नहीं है अपितु यह देखना की सभी उत्तर केवल मन को राहत देते हैं, जो है उसको देखने से ध्यान हटा देते हैं.

अब आप मूल प्रतिरोध, मूल असमंजस, मूल ऊर्जा जिससे जीवन चलायमान रहता है, को छू लेते हैं.

उत्तर पाने की आवश्यकता ही गिर जाती है. आप जीवन से एक हो जाते हैं. आप जीवन की अनवरत धारा को छू लेते हैं. रहस्य खुलने लगता है.

संसार आपके होने से ही है. ‘आप और संसार’ एक जुडी हुई प्रक्रिया है.   यही पूर्ण क्षेत्र है.

मन (भ्रम में) यह समझ लेता है की इस प्रक्रिया के पीछे, इस प्रक्रिया के अतिरिक्त कुछ और भी है – इस प्रक्रिया में जो इसको पसंद नहीं है, उससे राहत, आराम पाने के लिए या उसको नकारने के लिए.

इन्द्रियां देख, सुन, मह्सूस कर रही हैं। मन में स्मृति, कल्पना और विचार चलते हैं। क्या आप देख सकते हैं कि इन्द्रियों का क्षेत्र और विचार, अतीत, कल्पना का क्षेत्र पूर्ण क्षेत्र है?

आप जहां भी जाएं, यह क्षेत्र ही रहता है। यह जीवन का प्रारूप है.

भगवान का विचार या यह ‘ब्रह्माण्ड किसने बनाया’ भी इसी प्रारूप में ही उठता है.

लेकिन जीवन को कौन चलाता है?

यह भी एक विचार ही है. जीवन प्रक्रिया पल-पल ही है, आपकी स्मृति, कल्पना और विचार के साथ ही.

आप जो भी अनुभव करते हैं – संताप, प्रसन्नता, असमंजस, भय  इत्यादि इस प्रक्रिया के भीतर ही है. आप जो भी अनुभव करते हैं उससे भाग नहीं सकते. मन इस भ्रम में आ जाता है कि  इसे हमेशा प्रसन्न, आरामदायक अवस्था में ही रहना है. भगवान का विचार भी मन को आशा, राहत देने वाले साधन की तरह ही होता है. इस तरह प्रश्न टलता रहता है.

जब आप नापसंद की  बेआरामी को मन से बाहर नहीं फैंक सकते, पूर्ण क्षेत्र स्पष्ट हो जाता है.

Slide68-1

Y V Chawla

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