क्षमतायें ( Empowerment)

आपकी क्षमतायें अधिक जानने या अधिक वस्तुओं के होने से नहीं बढ़ती बल्कि यह अपने आप बढ़ जाती है-

जब आप यह देखते हैं कि आप कल के भविष्य के, परिणाम के बारे में आज संतुष्ट या निश्चिंत नहीं हो सकते।

जब आप यह देखते हैं के आप गलती करने के भय को हटा नहीं सकते।

जब आप हानि, बेइज्जती, असफ़लता से होने वाली बेआरामी से भाग नहीं सकते।

जब आप यह देखते हैं कि आप किसी भी गणना या प्रक्रिया के द्वारा निर्दोष चुनाव (flawless choice) करने में असमर्थ हैं।

जब आप रोज़मर्रा की मानसिक बेआरामी, खीझ, विवश्ता को  मनोरंजन, नशे, छुट्टियों, धार्मिक-आध्यात्मिक क्रियाओं से ढ़कने के आदी नहीं हो जाते।

ऊर्जा पूर्ण एकत्रित रहती है।

Y V Chawla

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अस्तित्व विस्मय की प्रक्रिया से चलता है न कि केवल गणनाओं और तर्कों के द्वारा

जब आपकी बनाई हुई योजनाएं पूरी नहीं होती तो आपका मन व्याकुल हो जाता है। यह पूर्ण विश्रांति को तब पाता है जब यह देख लेता है कि अस्तित्व विस्मय की प्रक्रिया से चलता है न कि केवल गणनाओं और तर्कों के द्वारा। और आप विस्मय की प्रक्रिया से अपने आप जुड़ जाते हैं जब आप किसी नापसंद स्थिति की बेआरामी से बच के नहीं निकलते।

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Y V Chawla

 

 

स्थिर आराम की तलाश भ्रम है

आप संतुष्ट या स्थिर आराम की अवस्था में नहीं रह सकते| कोई कमी,कोई आवश्यकता, कोई असुरक्षा आपके सामने आ जाएगी| जीवन कोई परिभाषित या सीमित प्रक्रिया नहीं है| जब आप यह देख लेते हैं कि आप स्थिर आराम या स्थिर प्रसन्नता की अवस्था में नहीं रह सकते-आपको जीवन ऊर्जा छू लेती है| 

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भगवान का विचार मन की कार्यविधि है

सत्य या भगवान को जानने के नाम पर मन एक आरामदायक अवस्था की तलाश में ही रहता है। यह मन की सीमा है। वह इससे आगे चाह ही नहीं सकता, जान ही नहीं सकता। मन इस भ्रम में रहता है जैसे सुख दुख को ढ़क सकता है। सत्य को जानने का अर्थ उस तल को देखना है, जहाँ सुख और दुख मित्र और पराये की तरह नहीं हैं अपितु मस्तिष्क को चलाने के लिये विषम ऊर्जा की तरह हैं। मन इस प्रक्रिया से बंधा हुआ है। यह देखना कि इस प्रक्रिया से निकलने का कोई रास्ता नहीं है, आपको असीमित से मिला देता है।

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स्वचालित मूल और मन की सक्रियता

जब आपको, जो हो रहा है या जो आपको परेशान कर रहा है, उसका कोई बुद्धिसंगत, तर्कसंगत, संतोषजनक उत्तर नहीं पाते हो-तो आप भगवान के विचार या किसी और सिद्धांत को अंतिम मानकर, उसकी तरफ आकर्षित हो जाते हो| यह मन के लिये आरामदायक है| क्या मन को इतना सक्रिय किया जा सकता है कि वो इस आराम को नकार दे| यह सक्रियता आपको, ‘जो है’ उसके सामने ला खडा़ कर देती है| मन एक परिवर्तित आयाम में आ जाता है|

आप अपनी बेआरामी और अनिश्चित्ता की अवस्था जिसका आप अनुभव कर रहे हैं, से भागने में अस्मर्थ हो जाते हैं। आप स्वचालित मूल से जुड़ जाते हैं।

आप अपनी बेआरामी और अनिश्चितता को मनोरंजन, वस्तुओं की अधिकता या भगवान इत्यादि के विचार से नकारने या हटाने की आशा में रहते हो| जब तक यह आशा भंग नहीं हो जाती, आप मूल को नहीं छू सकते|

 

 

 

तलाश, प्रसन्नता और बहकावा

आप सोचते हैं कि जैसे कोई और या कोई गुरु आदि मानसिक रूप से सुरक्षित, संतुष्ट, प्रसन्न रह रहे हैं और आप असंतुष्ट, असुरक्षित और अप्रसन्न तरीके से रह रहे हैं| —–

समस्या-हल की स्वचालित प्रक्रिया

आप समस्याओं या विकट परिस्थितिओं को देखकर उनका हल या उनको टालने या भविष्य में सुरक्षित होने के लिये धार्मिक-आध्यात्मिक क्रियाओं या विचारों का सहारा लेते हो| यह सहारा मन को भ्रमदायक आराम में ले जाता है| कोई भी समस्या या विकट परिस्थिति (जब आपके ऊपर कोई शारीरिक खतरा नहीं है), केवल एक मानसिक बेआरामी है| इस बेआरामी को जैसे है, वैसे ही समाहित करना आपको मूल से मिला देता है| आप समस्या-हल की स्वचालित प्रक्रिया को देख लेते हैं|

Y V Chawla