निराशा, असुरक्षा और मूल

आप यह सोच कर कि यह आरामदायक, सुरक्षित, अच्छा, ठीक होगा-सत्य को, मूल को नहीं जान सकते| आपको निराशा को झेलने के लिये तैयार रहना होगा, अगर आप मूल को वास्तव में देखना चाहते हो| आपको बेआरामी, असुरक्षा, बुरे, गलत के लिये भी स्थान देना होगा|

Y V Chawla

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नापसंद परिस्थिति की बेआरामी से भागना

आप किसी नापसंद परिस्थिति को अनदेखा कर सकते हैं या उससे भाग सकते हैं लेकिन आप उस बेआरामी से जो यह परिस्थिति आपके अंदर उत्पन्न कर रही है, से नहीं भाग सकते|

आप मूल धरातल पर हैं|
Y V Chawla

अस्पष्टता और अनिश्चिtतता में रुकने का रहस्य

मन अस्पष्टता और अनिश्चिtतता में रुकना नहीं चाहता| यह ‘जानने’ की संतुष्टि पाने में भागता रहता है| यह अस्पष्टता और अनिश्चिtतता के साथ रुकने के सामर्थ्य को, के रहस्य को नहीं जानता| इस सामर्थ्य को देखना आपको मूल से मिला देता है|

आगे देखने के लिये क्लिक करें:

http://www.speakingtree.in/public/spiritual-blogs/seekers/science-of-spirituality/t-440125

Y V Chawla

नापसंदीदा विचार और मूल का स्पर्श

हम इस भ्रम में रहते हैं जैसे कि हम नापसंदीदा विचारों को हटा सकते हैं या समाप्त कर सकते हैं| नापसंदीदा विचार वो हैं जो कल के बारे में या दूसरों के बारे में किसी भय या अनिश्चितता से संबंधित हैं| इस पल जब आप सुरक्षित और सकुशल हैं-यह देखना कि इन विचारों का इस पल कुछ नहीं किया जा सकता, एक बहुत बड़ा कदम है| यह ऊर्जा का पूर्ण केंद्रित हो जाना है| नापसंदीदा विचारों को ‘जैसे हैं वैसे ही’ समाहित करने पर जो भी कर्म (या अकर्म) उजागर होता है, पूर्ण होता है| मन तुरंत कोई आरामदायक विचार या व्याख्या से नापसंदीदा विचारों के उठते ही उनको ढ़क देता है-मूल का स्पर्श हो ही नहीं पाता|

Y V Chawla

https://sites.google.com/site/yvchawla/home/answers

निश्चितता और सुरक्षा

अगर आप इस पल शारीरिक तौर पर कुशल और सुरक्षित हैं तो दुख-सुख केवल मानसिक आराम या बेआरामी है और मानसिक आराम या बेआरामी को किसी भी बिंदु पर रोका नहीं जा सकता। यह देखना कि मानसिक निश्चितता या सुरक्षा को स्थिर नहीं किया जा सकता ऊर्जा को पूर्ण केंद्रित कर देता है, आपको मूल से मिला देता है।

Y V Chawla

http://www.speakingtree.in/public/4cf4d56c/blog

अज्ञात अंतर और अनंत संभावनाएं

मन लगातार व्याख्यायों, निष्कर्षों द्वारा संतुष्टि पाने में लगा रहता है. यह करने (या न करने) और देखने कि क्या होता है, में संतुष्ट नहीं होता। यह अज्ञात अंतर को सहन करने से डरता है। यह अज्ञात अंतर अनंत संभावनाओं का धरातल है। मन व्याख्यायों और निष्कर्षों द्वारा निश्चितता और आराम (भ्रामक) को पकड़ कर रखता है। इस आराम को छोड़ना मन को एक अनिर्णीत अवस्था में ले जाता है। यह अवस्था ही आपका मूल से संबध है।

Y V Chawla
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